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मै और मेरी कहानी

कभी लिखूँ खुद पर तो क्या लिखूँगी.. हज़ारो ख्वाइशे ऐसी जो चाही.... लेकिन पूरी ना हो पाई... कुछ सपने जो आँखों में रह गए , कुछ रास्ते जो मेरे कदमो में आकर मुड़ गए .., मेरे हिस्से का आसमां  जिसमे मैं उड़ सकूँ. लेकिन ज़िम्मेदारी की डोर ने कदमों क़ो बाँध दिया, मेरी भी ख्वाइशें थी बेवज़ह मुस्कुराने की, बिना डरे बेपरवाह उड़ जाने की... फिर हर बार खुद क़ो समझा लिया..., और दिल क़ो चुप करना सिखा लिया. कभी लिखूँगी " मै " क़ो... जो कही भीड़ में खो गई, जो हँसती तो हर रोज है, पर अंदर से थोड़ी 'रो' गई. कभी खुद क़ो लिख पाऊँ तो लिखूँगी.. अधूरी ज़िन्दगी की पूरी कहानी, जो मेरी ही थी... पर उसे पूरा ज़ी ना सकी...,     लवलीन  9may2026
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तुम्हारी ख़ुशी

तेरे हिस्से की सारी बेचैनीयां रखलूँ, तू कहे तो सारी परेशानियां भी रखलूँ । तुम खुश नही हो जिस पल में......, वो घड़ी मैं बन्द कर के तिजोरी में रखलूँ। तुम हाथ रख दो जिस पर भी अपना, कसम रब की उसे ताउम्र के लिए तुम्हारा कर दूं। तेरे हिस्से में भर कर खुशियां तमाम........., तुमसे ज़िन्दगी भर के लिए किनारा कर लूँ...।। लवलीन यदुवंशी 2.2.2024

दीवानापन

महरबा हम पे एक रात हुआ करती थी, आँख लगते ही मुलाकात हुआ करती थी, ये झुकी रात है और आंख में आँशु भी नही, ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी... आज . . . . . न गम है , न खुशी है जो तुझसे शोगात आज पाई है, आज बादल तो है फलक पर ...... पर बरसात नही है.....।। लवलीन यदुवंशी 18.9.2023

कभी कभी मेरे ख्यालों में ।

कभी कभी सोचती हूं, तुम बट चुके हो बहुत से किरदारो में, घर,परिवार, बच्चे, दोस्त........! . . मैं कहाँ हूँ इन सारो मे, कभी कभी सोचती हूँ कि क्या मुझे मिलोगे तुम इसी दुनिया मे, या मेरा इंतज़ार मेरी आखरी साँसों तक होगा, जाओ जी लो जिंदगी अपनी शर्तो पर, कुछ सच्चे झूठे रिश्तों के साथ, मैं भी याद तो जरूर आऊँगी मरने के बाद! यकीन दिलाती हूँ , तुम याद करोगे ओर मैं दौड़ी आउंगी, रिश्ता ये अहसासों का तब भी निभाऊंगी, जब कभी तुम सोचोगे मेरे बारे में ..... मैं हवा बन तुम्हारे बाल सहलाऊंगी, कभी थके हुए होंगे तो तुम्हारे पमाने में रस बरसाउंगी, कभी नींद सी, कभी ठंडी रात सी नजर आउंगी , हा मैं तब भी तुमको चाहूँगी ।। लवलीन यदुवंशी 28.01.2024

बदलते रिस्तो की रूप रेखा

बदलते जमाने के साथ हमने लोगो को बदलते देखा है दूर कही आसमान में बेलगाम उड़ते देखा है, कल तो जो अपना अपना कहते नही थकते थे , आज उन्हें हमने अल्फाज़ो का सुंदर प्रयोग करते देखा है, . . . . "चल हट हरामखोर बोल ना" कहते देखा है, . . . . उड़ने वालो मेरी आवाज पहुचे अगर तुम तक तो जरा संभल कर उड़ना ........, वहाँ से गिरने वालो को तिनके का सहारा भी नही होता है।। #लवलीन यदुवंशी 30.11.2023

तुमने सीखा दिया

हा अभी कुछ बुन रही हूँ, अल्फाज़ो को अभी मैं चुन रही हूँ... अच्छी सच्ची, यादों के मैं वो पल सुन रही हूँ, कभी तुम बातो को जो यूँ ... हा , हम्म बोल,  कह के खत्म करते हो बस वहीं , अधूरे से जज्बात समझ रही हूँ... तु जा.....ना  ये वाक्यशैली ,वाक्यांश या ... यूं कहूँ की रिश्तों की बारहखड़ी समझ रही हूँ।।
आज आप लोगो को एक कहानी सुनाती हूँ, जब कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद सारे पांडव भाइयों ने अपना अपना राज्य संभाल लिया ओर काफी लंबे समय तक राज्य पालन के बाद जब वे लोग अपने जीवन की अन्तिम घड़ी की ओर प्रस्थान कर रहे थे तब उन्होंने सोचा हम अपना देह त्याग हिमालय की गोद मे करेंगे तो पांचों पाण्डव निकल लिये साथ मे द्रौपदी भी थी .जब वो सारे बर्फ़ पे चलते जा रहे थे तो द्रौपदी का पैर बर्फ के घने गहरे गढ्डे में चला जाता है तो वह आवाज लगाती है कि मुझे यहाँ से निकलने में मेरी मदद करो . लेकिन युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों को पीछे मुड़ के देखने से भी मना कर देता है , अब द्रौपदी सोचती हैं की मैने सारी ज़िंदगी इनकी सेवा करने , इनको इकट्ठा रखने और अब अंत समय मे भी इन्ही के साथ देह त्याग करने तक का सफ़र इनलोगो के इर्द गिर्द बिता दिया आज ये लोग मेरे जीवन के आखिरी समय मे मेरा साथ देने से मना कर रहे हैं , मना किया वो ठीक है किंतु पीछे मुड़ कर भी नही देख रहे ....., अब द्रोपदी जी को अपने वासुदेव याद आते हैं.... ओर वह आंखे बंद करके दोनों हाथों को जोड़ कर एक बार फिर से वासुदेव को याद करती हैं, जैसे ही भगवान श्री कृष्ण उनके सामने...