कभी लिखूँ खुद पर तो क्या लिखूँगी..
हज़ारो ख्वाइशे ऐसी जो चाही....
लेकिन पूरी ना हो पाई...
कुछ सपने जो आँखों में रह गए ,
कुछ रास्ते जो मेरे कदमो में आकर मुड़ गए ..,
मेरे हिस्से का आसमां जिसमे मैं उड़ सकूँ.
लेकिन ज़िम्मेदारी की डोर ने कदमों क़ो बाँध दिया,
मेरी भी ख्वाइशें थी बेवज़ह मुस्कुराने की,
बिना डरे बेपरवाह उड़ जाने की...
फिर हर बार खुद क़ो समझा लिया...,
और दिल क़ो चुप करना सिखा लिया.
कभी लिखूँगी " मै " क़ो...
जो कही भीड़ में खो गई,
जो हँसती तो हर रोज है,
पर अंदर से थोड़ी 'रो' गई.
कभी खुद क़ो लिख पाऊँ तो लिखूँगी..
अधूरी ज़िन्दगी की पूरी कहानी,
जो मेरी ही थी...
पर उसे पूरा ज़ी ना सकी...,
लवलीन
9may2026

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