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क्या तुम जानते हों


दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये जानते हो,

मैं दिन को कहूँ रात तो, क्या तुम ये मानते हो,

उलझा देते हो सवालो में मुझे , क्या तुम ये जानते हो,

रोज़ ख्वाइशें रहती थी आप से मिलने की 

मेरे ज़ज्बातो के समंदर की गहराई , क्या तुम ये जानते हो ,

दो जिस्म एक जान हैं हम , क्या तुम जानते हो,

रोज़ बहाने बना कर मुझे सताते हो, क्या तुम ये मानते हो।।

लोग कहते हैं आदतें एक जैसी है हमारी , क्या तुम ये जानते हो,

बहुत मन्नतो से पाया है ये हक्कीत क्या तुम ये जानते हो,

मेरे पास तुम्हारे ना होने का दर्द  , क्या तुम ये जानते हो,

दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये मानते  हो,

दो जिस्म एक जान हैं हम .......................।।



#लवलीन यदुवंशी





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