आज आप लोगो को एक कहानी सुनाती हूँ, जब कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद सारे पांडव भाइयों ने अपना अपना राज्य संभाल लिया ओर काफी लंबे समय तक राज्य पालन के बाद जब वे लोग अपने जीवन की अन्तिम घड़ी की ओर प्रस्थान कर रहे थे तब उन्होंने सोचा हम अपना देह त्याग हिमालय की गोद मे करेंगे तो पांचों पाण्डव निकल लिये साथ मे द्रौपदी भी थी .जब वो सारे बर्फ़ पे चलते जा रहे थे तो द्रौपदी का पैर बर्फ के घने गहरे गढ्डे में चला जाता है तो वह आवाज लगाती है कि मुझे यहाँ से निकलने में मेरी मदद करो . लेकिन युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों को पीछे मुड़ के देखने से भी मना कर देता है , अब द्रौपदी सोचती हैं की मैने सारी ज़िंदगी इनकी सेवा करने , इनको इकट्ठा रखने और अब अंत समय मे भी इन्ही के साथ देह त्याग करने तक का सफ़र इनलोगो के इर्द गिर्द बिता दिया आज ये लोग मेरे जीवन के आखिरी समय मे मेरा साथ देने से मना कर रहे हैं , मना किया वो ठीक है किंतु पीछे मुड़ कर भी नही देख रहे ....., अब द्रोपदी जी को अपने वासुदेव याद आते हैं.... ओर वह आंखे बंद करके दोनों हाथों को जोड़ कर एक बार फिर से वासुदेव को याद करती हैं, जैसे ही भगवान श्री कृष्ण उनके सामने आते हैं वह बर्फ के गहरे घने गड्ढे में समाहीत हो जाती है .... ।
बोलो भगवान श्री कृष्ण जी की जय🙏🏻
यहाँ सिर्फ भजन की एक लाइन याद आती हैं:-
एक तम्मना है जीवन की निधिवन रात बिताऊँ,
सामने श्याम होवे फिर चाहे मैं मर जाऊं।।
बोलो भगवान श्री कृष्ण जी की जय🙏🏻
यहाँ सिर्फ भजन की एक लाइन याद आती हैं:-
एक तम्मना है जीवन की निधिवन रात बिताऊँ,
सामने श्याम होवे फिर चाहे मैं मर जाऊं।।
लवलीन यदुवंशी
28.4.2022
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