Skip to main content

माँ

               
                      * माँ *

सब कहते है मैं मेरी माँ की परछाई हूँ,
हा सब कहते हैं मैं मेरी माँ की परछाई हूँ,
आओ सब को मातृ दिवस पर अपनी माँ से मिलवाती हूँ ,
अपने शब्दों से मेरी माँ का एक चित्र तुम्हे दिखलाती हूँ,
बड़ी सुन्दर, बड़ी भोली , बड़ी नादान हैं ," माँ "
बड़ी सहज , बड़ी कोमल बड़ी मासूम हैं ,"माँ ",
यादें मेरे बचपन की उन्ही के साथ हैं सब,
हमारे पालन पोषण में पिता से ज्यादा योगदान है उनका,
पापा मेरे फ़ौजी थे ,
सब भार छोड़ गए माँ पर ........,
सब भार छोड़ कर माँ पर दुनिया से नाता तोड़ गए,
माँ तो आखिर माँ है बिन कुछ कहे ही समझ जाती हैं,
आज भी मेरी हर उलझन को वो चुटकियो में सुलझाती हैं
माँ में मुझे अपनी गुरु , अपनी सखी नजर आती हैं ,
माँ के इन सब स्वरूपों को मिला दो तो  वो मेरी माँ बन जाती हैं,
माँ ने अपना सारा जीवन हम बच्चो में घोल दिया ,
याद पिता की हमे ना आये, अपने होठों को सिल लिया ,
मई महीना जाने कैसे संयोग से आता हैं, मातृदिवस ओर पिता की बरसी को एक कर जाता है,
धन्य हो मेरी माँ जिसने हमको जन्म दिया ,
कोशिस तो बहुत की मैने शब्दों से माँ का चित्र बनाने की ,
मैं नादान ये भूल गई , जिसने मुझको बनाया ,
उसको मैं कैसे उसे बना सकती हूँ .....,
हा मैं मेरी माँ की परछाई हूँ ,
हूबहू तो नही पर थोड़ी सी मेरी माँ मुझमे भी समाई हैं,
सब कहते हैं मैं मेरी माँ की परछाई हूँ।

 🙏🙏It's only for u munna


#लवलीन यदुवंशी

 I love u mummy & Happy mother's day ... 🙏🙏

Comments

Popular posts from this blog

मै और मेरी कहानी

कभी लिखूँ खुद पर तो क्या लिखूँगी.. हज़ारो ख्वाइशे ऐसी जो चाही.... लेकिन पूरी ना हो पाई... कुछ सपने जो आँखों में रह गए , कुछ रास्ते जो मेरे कदमो में आकर मुड़ गए .., मेरे हिस्से का आसमां  जिसमे मैं उड़ सकूँ. लेकिन ज़िम्मेदारी की डोर ने कदमों क़ो बाँध दिया, मेरी भी ख्वाइशें थी बेवज़ह मुस्कुराने की, बिना डरे बेपरवाह उड़ जाने की... फिर हर बार खुद क़ो समझा लिया..., और दिल क़ो चुप करना सिखा लिया. कभी लिखूँगी " मै " क़ो... जो कही भीड़ में खो गई, जो हँसती तो हर रोज है, पर अंदर से थोड़ी 'रो' गई. कभी खुद क़ो लिख पाऊँ तो लिखूँगी.. अधूरी ज़िन्दगी की पूरी कहानी, जो मेरी ही थी... पर उसे पूरा ज़ी ना सकी...,     लवलीन  9may2026

क्या तुम जानते हों

दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये जानते हो, मैं दिन को कहूँ रात तो, क्या तुम ये मानते हो, उलझा देते हो सवालो में मुझे , क्या तुम ये जानते हो, रोज़ ख्वाइशें रहती थी आप से मिलने की  मेरे ज़ज्बातो के समंदर की गहराई , क्या तुम ये जानते हो , दो जिस्म एक जान हैं हम , क्या तुम जानते हो, रोज़ बहाने बना कर मुझे सताते हो, क्या तुम ये मानते हो।। लोग कहते हैं आदतें एक जैसी है हमारी , क्या तुम ये जानते हो, बहुत मन्नतो से पाया है ये हक्कीत क्या तुम ये जानते हो, मेरे पास तुम्हारे ना होने का दर्द  , क्या तुम ये जानते हो, दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये मानते  हो, दो जिस्म एक जान हैं हम .......................।। #लवलीन यदुवंशी

हमारा मिलन

तुम चाँद तो मैं सितारा बन गई, तुम रात तो मैं मिठी सुबह बन गई, तुम गहरा सागर तो मैं किनारा बन गई, तुम शाम तो मैं उजाला बन गई, तुम जो रोज़ यूँ मिलने की बात करते हो, तो.....? वो देखो..., वो देखो ना...., वो देखो दूर क्षितिज पर ..... कुछ ऐसा होगा हमारा मिलन.........!! #लवलीन यदुवंशी