Skip to main content

इश्क़ चालीस का

इश्क़ चालीस का कुछ नया सा ,
कभी खुशबु से भरा सा ,
कभी खट्टी मीठी यादों सा,
कभी धूप सा 
कभी छाँव सा,
कभी तेरे विरह की पीड़ा सा,
कभी मिलने की खुशी सा,
इश्क़ चालीस का कुछ नया सा ,
कभी तुम्हें ना पाने का गम सा,
कभी तुम्हें फिर से पा लेने की खुशी सा,
कभी तुम्हारे गुस्सा सा,
कभी मुस्कुराहट सा ,
कभी अपना सा,
कभी पराया सा,
इश्क़ चालीस का कुछ नया सा ,
कभी तुम्हारे नाम सा,
कभी बे बुनियाद सा,
कभी चुलबुला सा,
कभी पानी का बुलबुला सा,
कभी याद सा ,
कभी फरियाद सा
इश्क़ चालीस का कुछ नया सा,
कभी उमंग सा,
कभी तरंग सा,
कभी झील सा,
कभी आवेग सा,
कभी निर्मल सा,
कभी पावन सा,
इश्क़ चालीस का कुछ नया सा ,
कभी अदब सा,
कभी बेशर्म सा,
कभी मासूम सा,
कभी बालों की सफेदी सा,
कभी तुम सा कभी मुझ सा,
इश्क़ चालीस का कुछ नया सा...!
इश्क़ चालीस का सिरफिरा सा..!

#लवलीन यदुवंशी 
8 अप्रैल 2022

Comments

Popular posts from this blog

मै और मेरी कहानी

कभी लिखूँ खुद पर तो क्या लिखूँगी.. हज़ारो ख्वाइशे ऐसी जो चाही.... लेकिन पूरी ना हो पाई... कुछ सपने जो आँखों में रह गए , कुछ रास्ते जो मेरे कदमो में आकर मुड़ गए .., मेरे हिस्से का आसमां  जिसमे मैं उड़ सकूँ. लेकिन ज़िम्मेदारी की डोर ने कदमों क़ो बाँध दिया, मेरी भी ख्वाइशें थी बेवज़ह मुस्कुराने की, बिना डरे बेपरवाह उड़ जाने की... फिर हर बार खुद क़ो समझा लिया..., और दिल क़ो चुप करना सिखा लिया. कभी लिखूँगी " मै " क़ो... जो कही भीड़ में खो गई, जो हँसती तो हर रोज है, पर अंदर से थोड़ी 'रो' गई. कभी खुद क़ो लिख पाऊँ तो लिखूँगी.. अधूरी ज़िन्दगी की पूरी कहानी, जो मेरी ही थी... पर उसे पूरा ज़ी ना सकी...,     लवलीन  9may2026

क्या तुम जानते हों

दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये जानते हो, मैं दिन को कहूँ रात तो, क्या तुम ये मानते हो, उलझा देते हो सवालो में मुझे , क्या तुम ये जानते हो, रोज़ ख्वाइशें रहती थी आप से मिलने की  मेरे ज़ज्बातो के समंदर की गहराई , क्या तुम ये जानते हो , दो जिस्म एक जान हैं हम , क्या तुम जानते हो, रोज़ बहाने बना कर मुझे सताते हो, क्या तुम ये मानते हो।। लोग कहते हैं आदतें एक जैसी है हमारी , क्या तुम ये जानते हो, बहुत मन्नतो से पाया है ये हक्कीत क्या तुम ये जानते हो, मेरे पास तुम्हारे ना होने का दर्द  , क्या तुम ये जानते हो, दो जिस्म एक जान हैं हम, क्या तुम ये मानते  हो, दो जिस्म एक जान हैं हम .......................।। #लवलीन यदुवंशी

हमारा मिलन

तुम चाँद तो मैं सितारा बन गई, तुम रात तो मैं मिठी सुबह बन गई, तुम गहरा सागर तो मैं किनारा बन गई, तुम शाम तो मैं उजाला बन गई, तुम जो रोज़ यूँ मिलने की बात करते हो, तो.....? वो देखो..., वो देखो ना...., वो देखो दूर क्षितिज पर ..... कुछ ऐसा होगा हमारा मिलन.........!! #लवलीन यदुवंशी